Delhi University : DUSU चुनाव में हाईकोर्ट आदेश की अनदेखी, पोस्टरों और ढोल नगाड़ों से हुआ जमकर प्रचार
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी DUSU चुनाव में वोटिंग के दिन वह नजारा देखने को मिला, जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद सड़कों पर पोस्टर, बैनर और ढोल-नगाड़ों के साथ जमकर प्रचार किया गया। यह स्थिति न केवल अदालत की मर्यादा को ठेस पहुंचाती है बल्कि आने वाले समय में छात्र राजनीति की तस्वीर पर भी सवाल खड़े करती है।
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव यानी DUSU चुनाव शहर में हमेशा चर्चा का विषय बने रहते हैं। इस बार का चुनाव भी अलग नहीं रहा, बल्कि इसमें एक और नई चर्चा जुड़ गई – हाईकोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाने की। जिस दिन हजारों छात्र वोट डालने निकले, उसी दिन अदालत के उस निर्देश को दरकिनार कर दिया गया, जिसमें साफ कहा गया था कि वोटिंग के दिन किसी तरह का प्रचार-प्रसार नहीं होगा। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई दी। सुबह से ही सड़कों पर हर तरफ रंग-बिरंगे प्रिंटेड पोस्टर्स बिखरे नजर आए।
कुछ इलाकों में तो हालात ऐसे थे कि रास्ता चलते हर दीवार पर किसी न किसी उम्मीदवार का नाम चमकता दिखा। चुनाव आयोग ने जहां इस बार के DUSU चुनाव को निष्पक्ष और शांतिपूर्ण बनाने का दावा किया था, वहीं विद्यार्थी और राहगीर इन दावों को खोखला समझने लगे। क्योंकि सिर्फ पोस्टर्स ही नहीं, बल्कि कई जगहों पर ढोल बजाकर उम्मीदवारों के समर्थन में नारे भी लगते रहे। यह सब देखकर साफ समझ आता है कि आदेश कागजों पर तो दिखाई देता है, लेकिन जमीन पर इसका असर नजर नहीं आता।
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ढोल नगाड़ों के बीच माहौल बना मेलों जैसा
शहर के कई इलाकों खासकर उत्तर कैंपस की गलियों में चुनाव का माहौल किसी मेले से कम नहीं था। वोट डालने आए छात्र-छात्राओं को लुभाने के लिए समर्थक ढोल नगाड़े बजाते नजर आए। नारेबाजी इतनी तेज थी कि छात्रों को मतदान केंद्र तक पहुंचने में असुविधा हुई। लोग यह देखकर हैरान थे कि हाईकोर्ट के सख्त आदेश के बाद भी प्रचार की तस्वीर खामोश नहीं हुई, बल्कि और भी जोर शोर से सामने आई।
कई छात्रों ने बातचीत में कहा कि इस तरह का माहौल न तो लोकतंत्र के अनुरूप है और न ही छात्रों के बीच सही संदेश देता है। DUSU चुनाव हमेशा से छात्र राजनीति की बड़ी तस्वीर पेश करते हैं। यहां से निकलने वाले नेताओं का राष्ट्रीय राजनीति में भी असर देखने को मिलता है। लेकिन जब वोटिंग जैसे अहम दिन को भी सिर्फ ढोल नगाड़ों और नारेबाजी का मैदान बना दिया जाए, तो सवाल यह उठता है कि पारदर्शिता कहां रह गई। अदालत के आदेश को नजरअंदाज करना छात्रों के बीच यह संदेश देता है कि नियम सिर्फ दिखाने के लिए हैं।
पोस्टरों से पटी दिल्ली की दीवारें
दिल्ली विश्वविद्यालय का इलाका इस बार सचमुच रंगीन कागजों से पट गया। सड़कों पर पड़े फटे पोस्टर, दीवारों पर चिपके बड़े-बड़े तस्वीरों वाले पोस्टर और बिजली के खंभों तक पर प्रचार सामग्री चिपकी नजर आई। साफ दिखाई दिया कि यह चुनाव सिर्फ मत पाने का नहीं, बल्कि हाईकोर्ट के फैसले को सीधी चुनौती देने जैसा बन गया। अदालत ने साफ निर्देश दिया था कि किसी भी तरह की लिखाई-पढ़ाई वाली सामग्रियां जैसे प्रिंटेड पोस्टर का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। लेकिन नतीजा यह निकला कि आदेश को मानने वाला शायद कोई नहीं था।
छात्रों और अध्यापकों ने यह भी शिकायत की कि यह दृश्य शहर की छवि को गंदा करता है। कूड़े की तरह सड़कों पर पड़े पोस्टर साफ-सफाई और पर्यावरण पर भी सवाल खड़े करते हैं। राजधानी में जो चुनाव होना चाहिए था अनुशासन और मर्यादा में, वह गंदगी और अव्यवस्था का प्रतीक बन गया। यह चुनाव अगर लोगों को छात्र राजनीति का असली चेहरा दिखाता है, तो उसके साथ ही प्रशासन की नाकामी भी उजागर करता है। DUSU चुनाव के आसपास की हर दीवार पर उकेरे गए नाम सिर्फ छात्रों को ही नहीं, दिल्ली की छवि को भी नुकसान पहुंचा गए।
प्रशासनिक दावे और असली नजारा
दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना था कि उन्होंने हर जरूरी कदम उठाया है ताकि चुनाव निष्पक्ष और शांतिपूर्ण ढंग से हो। लेकिन अगर जमीन की हकीकत देखी जाए तो तस्वीर पूरी तरह अलग नजर आई। छात्र संगठनों के समर्थक खुलेआम वोटिंग के दिन पोस्टर चिपकाते और प्रचार करते नजर आए। कई बार पुलिस की गाड़ियां भी वहीं से गुजरीं लेकिन किसी तरह की रोकटोक नहीं की।
यह सवाल उठना लाजमी है कि जब हाईकोर्ट का आदेश था और प्रशासन को पहले से ही जानकारी थी, तो फिर कड़ी निगरानी क्यों नहीं की गई। छात्रों और अध्यापकों ने माना कि प्रशासन और चुनाव आयोग केवल बयानबाजी में सख्त हैं। जब बात मैदान में आती है तो वे कमजोर साबित हो जाते हैं। यही वजह है कि DUSU चुनाव जैसी अहम प्रक्रिया भी विवादों और अव्यवस्था में घिर जाती है। जनता, छात्र और समाज को इससे यह संदेश मिलता है कि अगर अदालत के आदेश तक को नजरअंदाज किया जा सकता है, तो बाकी नियम कितने कमजोर होंगे।
छात्र राजनीति और लोकतंत्र पर असर
DUSU चुनाव को हमेशा से भारत की छात्र राजनीति की धुरी माना जाता है। यहां से निकले नेता आगे चलकर देश की राजनीति की दिशा तय कर चुके हैं। ऐसे में अगर वोटिंग के दिन अदालत के आदेश की इस तरह से अनदेखी की जाती है, तो यह छात्रों को गलत दिशा में ले जा सकता है। लोकतंत्र की असली शक्ति अनुशासन और नियमों के सम्मान में है। लेकिन जब छात्र पहली बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया को इतनी गंदगी और शोर-शराबे से जुड़ा हुआ देखते हैं, तो वे यही सीखते हैं कि राजनीति में नियमों की जगह जोर-शोर ज्यादा मायने रखता है।
कई विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और चुनाव आयोग को मिलकर सख्त कदम उठाने होंगे। अगर वोटिंग के दिन भी प्रचार और गंदगी थमी नहीं, तो आने वाले वर्षों में यह और बड़ा रूप ले सकती है। युवा पीढ़ी को सही लोकतांत्रिक संस्कृति सिखाने के लिए जरूरी है कि DUSU चुनाव में नियम और आदेशों का पालन हो। यह केवल एक छात्र संगठन के चुनाव की बात नहीं है, बल्कि पूरे देश की लोकतांत्रिक सोच से जुड़ा सवाल है।
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नाम है सौरभ झा, रिपोर्टर हूँ GCShorts.com में। इंडिया की राजनीति, आम लोगों के झमेले, टेक या बिज़नेस सब पर नजर रहती है मेरी। मेरा स्टाइल? फटाफट, सटीक अपडेट्स, सिंपल एक्सप्लेनर्स और फैक्ट-चेक में पूरा भरोसा। आप तक खबर पहुंचे, वो भी बिना घुमा-फिरा के, यही मकसद है।
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