Indian Navy : का पहला स्वदेशी 3D एयर सर्विलांस रडार दुश्मन के हवाई टारगेट अब नहीं बच पाएंगे
भारतीय नौसेना ने अपना पहला स्वदेशी 3D एयर सर्विलांस रडार कमीशन किया है, जो हर हवाई टारगेट को पकड़ सकता है और अब दुश्मन का कोई विमान या ड्रोन नहीं बचेगा।
कल मुंबई के नवल डॉकयार्ड में भारतीय नौसेना का पहला स्वदेशी 3D एयर सर्विलांस रडार औपचारिक रूप से सेवा में शामिल किया गया। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, नौसेना प्रमुख एडमिरल आर. हरि कुमार और वरिष्ठ वैज्ञानिक मौजूद थे। भारत में विकसित यह सिस्टम जहाजों को आसमान का त्रि–आयामी नक्शा दिखाता है। दुश्मन का कोई भी हवाई टारगेट रडार की नज़र से बच नहीं पाएगा। समारोह में बजती नौसैनिक धुनों के बीच गर्व, रोमांच और आत्मविश्वास महसूस किया गया। यह घटना भारतीय समुद्री इतिहास में एक बड़ा मोड़ मानी जा रही है।
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जहाज की आंख बन गया स्वदेशी 3D रडार सिस्टम
यह अत्याधुनिक रडार आईएनएस नीलगिरि श्रेणी के नए फ्रिगेट पर लगाया गया है। उपकरण का वजन पुराने विदेशी मॉडलों से कम है, इसलिए जहाज की रफ्तार और संतुलन बेहतर रहते हैं। रडार हर सेकंड घूमकर आसमान को परत-दर-परत पढ़ता है और तैयार स्थिति-चित्र तुरंत कमांड सेंटर की विशाल स्क्रीन पर भेजता है। अधिकारी किसी भी संदिग्ध वस्तु की दिशा, ऊंचाई और रफ्तार एक ही नज़र में समझ लेते हैं। प्रतिक्रिया का समय घटकर कुछ ही पल रह जाता है, जिससे युद्धपोत को निर्णायक बढ़त मिलती है।
कैसे काम करता है तीन आयामी एयर सर्विलांस का जादुई चश्मा
इस 3D रडार में सैकड़ों छोटे ट्रांसमीटर और रिसीवर लगे हैं। यह माइक्रोवेव सिग्नल आसमान की ओर भेजते हैं और लौटने वाली तरंगों का बारीक विश्लेषण करते हैं। सिस्टम लक्ष्य की दूरी, दिशा और ऊंचाई साथ-साथ मापता है। पारंपरिक 2D रडार से अलग, इसमें ऊर्ध्व दिशा की सटीकता कई गुना ज़्यादा है। यही विशेषता इसे ड्रोन, लड़ाकू विमान और तेज़ गति वाली क्रूज़ मिसाइल तक पकड़ने में सक्षम बनाती है। समंदर पर उड़ते पक्षी और बादल जैसी प्राकृतिक बाधाएँ भी अल्गोरिद्म के ज़रिए फ़िल्टर हो जाती हैं, जिससे झूठे अलर्ट नहीं के बराबर मिलते हैं।
डीआरडीओ और बीईएल ने मिलकर गढ़ी आत्मनिर्भरता की मिसाल
रडार का डिज़ाइन डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइज़ेशन ने तैयार किया, जबकि निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने किया। दोनों संस्थाओं की टीमों ने पाँच साल से अधिक समय तक परीक्षण किए। कच्चे माल से लेकर सॉफ़्टवेयर तक, हर घटक देश में बना है। इससे लागत घटी और घरेलू उद्योग को बड़ा प्रोत्साहन मिला। रक्षा मंत्री ने अपने भाषण में कहा कि मेक-इन-इंडिया अब नारे से आगे बढ़कर हकीकत बन चुका है। आने वाले वर्षों में ऐसे कई उन्नत रडार तट-रक्षा से लेकर एयरक्राफ्ट कैरियर तक लगने वाले हैं।
दूर तक मंडराते ड्रोन और मिसाइल अब पलभर में पकड़ाएंगे
रडार की अधिकतम रेंज 400 किलोमीटर से भी ज़्यादा है। यह कम ऊंचाई पर उड़ते छोटे क्वैड-कॉप्टर ड्रोन से लेकर 30 हज़ार फुट की ऊंचाई पर आने वाली सुपरसोनिक मिसाइल तक पहचानने में सक्षम है। तेज़ प्रोसेसर लक्ष्य की गति का हिसाब लगाकर वास्तविक-समय में भविष्यवाणी करता है कि वह अगले दस सेकंड में कहाँ होगा। इससे रक्षा प्रणाली त्वरित काउंटर-मेजर, जैसे सतह-से-हवा मिसाइल या जामिंग सिग्नल, तुरंत सक्रिय कर सकती है। दुश्मन को प्रतिक्रिया का मौका मिलने से पहले ही उसका मंसूबा नाकाम हो जाता है।
समुद्री सीमाओं पर चौबीसों घंटे चौकसी का भरोसेमंद साथी
भारतीय नौसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हिंद महासागर क्षेत्र में तटीय देशों की गतिविधियाँ बढ़ रही हैं। कई बार संदिग्ध एयरक्राफ्ट पहचान से बचने की कोशिश करते हैं। नया रडार हर मौसम में, चाहे रात हो या घना बादल, निगरानी जारी रखता है। जहाज के कंट्रोल रूम में लगी चेतावनी-लाइटें और ऑडियो अलर्ट पल-पल की सूचना देते हैं। इससे गश्ती दल को नज़र हटाने की ज़रूरत नहीं पड़ती और समुद्री सीमा पर लगातार मानवीय सतर्कता बनी रहती है।
इंडियन ओशन रीजन में बढ़ती चुनौतियों का उपयुक्त जवाब
पिछले दशक में इस क्षेत्र में चीन सहित कई देशों ने अपने जहाज और पनडुब्बियाँ तैनात की हैं। हवाई टोही के बिना समुद्री दबाव का जवाब देना कठिन हो जाता है। स्वदेशी 3D रडार जहाज को एक चलता-फिरता हवाई कंट्रोल रूम बना देता है। यह मित्र देशों के विमानों की पहचान “दोस्त या दुश्मन” तकनीक से करता है, जिससे सैन्य तालमेल आसान हो जाता है। साथ ही, तटीय राडार नेटवर्क को रियल-टाइम डेटा भेजकर एक साझा ऑपरेशनल चित्र तैयार करता है, जिससे पूरे क्षेत्र में निर्णय-क्षमता तेज़ हो जाती है।
कमान्डरों की जुबानी–कैसे बदली हमारी रणनीतिक सोच
आईएनएस नीलगिरि के कमान अधिकारी कैप्टन अनिरुद्ध राय का कहना है कि नई तकनीक ने प्रशिक्षण पद्धति भी बदल दी है। अब कैडेट्स को वर्चुअल सिम्युलेटर पर 3D स्क्रीन के साथ अभ्यास कराया जाता है। रडार का इंटरफ़ेस इतना सहज है कि दो हफ्ते की ट्रेनिंग में कोई भी ऑपरेटर इसे चलाना सीख सकता है। वैज्ञानिकों ने स्थानीय भाषाओं में वॉइस-प्रॉम्प्ट भी जोड़े हैं, ताकि सूचना तुरंत समझ में आए। कमान अधिकारी के शब्दों में, “हमें अब हवा से आने वाले ख़तरे का अंदाज़ा पहले से कहीं जल्दी हो जाता है, और यही समय हमें जीत दिलाता है।”
दूरदृष्टि वाला कदम, भविष्य के युद्धपोतों के लिए आधार
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगली पीढ़ी के स्टील्थ युद्धपोतों की डिज़ाइन इसी रडार के इर्द-गिर्द तय होगी। हल्का वजन, कम बिजली खपत और मॉड्यूलर बनावट इसे नए जहाजों में लगाना आसान बनाती है। भविष्य में जब हाइपरसोनिक हथियार मैदान में उतरेंगे, तब भी इस रडार के सॉफ़्टवेयर को सिर्फ़ अपडेट कर क्षमता बढ़ाई जा सकेगी। यानी एक बार का निवेश आने वाले दशकों तक कारगर रहेगा। इससे रक्षा बजट पर बोझ नहीं बढ़ेगा और परिचालन उपलब्धता बनी रहेगी।
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