रेड फोर्ट ब्लास्ट केस में एक और संदिग्ध डिटेन, पुलवामा से इलेक्ट्रीशियन तुफैल सुरक्षाबलों के हत्थे चढ़ा
रेड फोर्ट ब्लास्ट केस में पुलवामा के इलेक्ट्रीशियन तुफैल की गिरफ्तारी ने मामले को फिर जगा दिया है। कहानी में कई नई परतें और शक की दिशा बदलती दिख रही है।
कभी-कभी खबरें अचानक ऐसे सामने आ जाती हैं जैसे किसी ने एकदम तेज़ी से दरवाज़ा खोला हो। मेरे साथ यही हुआ जब मुझे पता चला कि रेड फोर्ट ब्लास्ट मामले में एक और संदिग्ध का नाम उभर रहा है—पुलवामा का इलेक्ट्रीशियन तुफैल। हाँ, वही साधारण रोज़मर्रा वाला काम करने वाला व्यक्ति। यह सुनकर मन में अजीब-सा खिंचाव हुआ। क्योंकि सच कहूँ तो जो लोग रोज़ बिजली की तारों में उलझे रहते हैं, उनके बारे में दिमाग कभी ऐसे मोड़ पर नहीं जाता।
लेकिन कहानी यहीं थमने वाली नहीं थी। और हाँ, एक बात और… तुफैल का नाम सामने आते ही पुरानी यादें मन में उठने लगीं। खासकर वह समय जब मैं कश्मीर क्षेत्र में फील्ड रिपोर्टिंग करता था। एक बार कुपवाड़ा की तरफ एक डीलर से मिलने गया था। वहाँ सुरक्षाबलों की जांच में मेरे स्कूटर का साइलेंसर तक खोल दिया गया था। बस शक था, और कुछ नहीं। उस दिन की खटास आज भी मन के किसी कोने में बची हुई है। जब भी ऐसी खबर आती है, वही पुराना एहसास फिर ताज़ा हो जाता है।
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तुफैल—साधारण इलेक्ट्रीशियन या कुछ अलग परतें?
सीधी बात बोल दूँ… हर बार जब किसी आम व्यक्ति का नाम किसी बड़े मामले से जुड़ता है तो मन थोड़ा बिगड़ जाता है। तुफैल अपने को तो बस एक साधारण बिजली मिस्त्री कहता है, लेकिन फिर वही सवाल मन में घूमता है—आखिर कैसे कोई रोज़ के मामूली काम में लगा व्यक्ति ऐसी कहानी में आ जाता है? कुछ बातें कही जा रही हैं, कुछ अंदाज़े लगाए जा रहे हैं, पर सच्चाई अभी धुँधली है।
एक छोटा-सा किस्सा याद आ रहा है। लगभग पाँच-छह साल पहले श्रीनगर में एक इलेक्ट्रिक स्कूटर के लॉन्च को कवर करने गया था। स्कूटर की बैटरी इतनी गरम थी कि टेस्ट राइड के बीच में ही फ़्यूज़ उड़ गया। कंपनी कह रही थी कि यह “बहुत दुर्लभ घटना” है। पर मेरा हाथ सच में जल गया था। बस इसी वजह से जब भी किसी सिस्टम—चाहे मशीन वाला हो या इंसानों वाला—को ज़रा ज़्यादा परफ़ेक्ट बताया जाता है, मन में पहले ही एक छोटा-सा संशय पैदा हो जाता है।
सुरक्षा एजेंसियों की तेजी… लेकिन ज़मीनी हालात हमेशा थोड़े उलझे रहते हैं
कहा जा रहा है कि तुफैल कुछ संदिग्ध गतिविधियों में पकड़ा गया। ठीक है। पर जो असल स्थितियाँ होती हैं, उनका पता तब चलता है जब आप उन इलाकों में घूमे हों। मुझे याद है, गुलमर्ग की सड़क पर एक स्थानीय गाइड ने हँसते हुए कहा था, “यहाँ कभी-कभी आदमी का चेहरा भी गलती से गलत लग जाता है।” और सच में, उसी दिन एक पर्यटक को सिर्फ इसलिए दो घंटे रोक लिया गया था क्योंकि उसका बैग थोड़ा भारी लग रहा था।
इसलिए जो भी बातें तुफैल के इर्द-गिर्द सामने आ रही हैं, वे सीधी रेखा की तरह नहीं होंगी। यह कहानी तिरछी है। कहीं धीमी, कहीं तेज़। कभी अचानक पलट जाने वाली।
क्या रेड फोर्ट ब्लास्ट की फ़ाइल सच में थम रही थी?
जहाँ तक मेरी सोच है… यह पूरा मामला कुछ वैसा लगता है जैसे कोई पुरानी गाड़ी जिसे आप समझ रहे हों कि अब शायद चलने से रही, और अचानक वह एक अजीब सी आवाज़ के साथ फिर स्टार्ट हो जाए। अटका हुआ इतिहास जैसे फिर किसी मोड़ पर जागता है।
लोग बड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हैं—राष्ट्र सुरक्षा, खतरे, नेटवर्क। लेकिन जब किसी असली व्यक्ति का नाम इन कहानियों में आता है, मामला थोड़ा और व्यक्तिगत महसूस होने लगता है। चाहे वह एक इलेक्ट्रीशियन हो या कोई आम मजदूर—जीवन कभी एक छोटी-सी टक्कर से पूरी दिशा बदल लेता है।
अब आगे क्या?
फिलहाल तो यह बस एक नई शुरुआत लग रही है। तुफैल की गिरफ्तारी शायद कई और परतों को सामने लाएगी। कुछ बातें साफ़ होंगी, कुछ और उलझेंगी। जैसे गरम तारों का गुच्छा जिसे आप सुलझाने की कोशिश करें और अचानक एक नई गाँठ मिल जाए।
एक बात कहते हुए अंतिम पंक्ति लिख रहा हूँ। कश्मीर और दिल्ली के बीच चलने वाली बड़ी कहानियाँ हमेशा सुर्खियाँ बना देती हैं, पर असल घबराहट, असल उलझन तो उन लोगों के भीतर बैठती है जो इन क्षेत्रों में रोज़ काम करते हैं। मुझे तो आज भी याद है—जब मेरा साइलेंसर खोलते वक्त एक सैनिक ने मुस्कुराकर कहा था, “अगर कुछ निकला न… तो फिर आगे का scene याद रखना।”
यह लेख बस मेरी निजी नज़र से लिखा गया है—जो देखा, महसूस किया, वही उतारा। बाकी बातें तो समय अपनी चाल में खुद बताता है।
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